The Great Liberation Tantra· 2.37 / 54

The Great Liberation Tantra2.37

2.37
लोकातीतो लोकहेतुरवाङ्मनसगोचरः । स वेत्ति विश्वं सर्वज्ञस्तं न जानाति कश्चन ॥३७॥
lokātīto lokaheturavāṅmanasagocaraḥ | sa vetti viśvaṃ sarvajñastaṃ na jānāti kaścana ||37||
— लोक से अतीत ; — लोक का हेतु ; — वाणी और मन की पहुँच से परे ; — वह ; — जानता है ; — विश्व को ; — सर्वज्ञ ; — उसे ; — नहीं ; — जानता ; — कोई

लोक से अतीत, लोक का हेतु, वाणी और मन की पहुँच से परे। वह सर्वज्ञ विश्व को जानता है, पर उसे कोई नहीं जानता।