Vijñāna Bhairava Tantra · 1.162

Vijñāna Bhairava Tantra 1.162

1.162
कुलगुह्यं समाख्यातं न देयं प्रोक्ष्य कस्यचित् । शिष्याय भक्तियुक्ताय अन्यथा गुरुघातकः ॥१६२॥
kulaguhyaṃ samākhyātaṃ na deyaṃ prokṣya kasyacit | śiṣyāya bhaktiyuktāya anyathā gurughātakaḥ
anuṣṭubh
— कुल-गुह्य, कुल-परम्परा का रहस्य (कर्ता कारक — समासगत) ; — भक्ति-युक्त शिष्य को (सम्प्रदान कारक — समासगत) ; — गुरु-घातक, गुरु का घात करने वाला (कर्ता कारक — समासगत)

यह कुल-गुह्य (कुल-परम्परा का गुप्त रहस्य) कहा गया है — इसे किसी भी (अयोग्य) को न दिया जाए; यह केवल भक्ति-युक्त शिष्य को (देय है) — अन्यथा (देने वाला) गुरु-घातक (होता) है।