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Vijñāna Bhairava Tantra· 1.161 / 163

Vijñāna Bhairava Tantra1.161

1.161
इत्युक्त्वानन्दिता देवी कण्ठे लग्ना शिवस्य तु । एवमेतत्प्रियं तन्त्रं भैरवेण समुद्धृतम् ॥१६१॥
ity uktvānanditā devī kaṇṭhe lagnā śivasya tu | evam etat priyaṃ tantraṃ bhairaveṇa samuddhṛtam
anuṣṭubh
— आनन्दित, हर्षित (विशेषण स्त्रीलिङ्ग) ; — कण्ठ में लग गई (अधिकरण + भूत कृदन्त) ; — समुद्धृत, प्रकट किया गया (कर्मवाच्य भूत कृदन्त)

ऐसा कहकर आनन्दित देवी शिव के कण्ठ में लग गईं (आलिङ्गन कर लिया); इस प्रकार यह प्रिय तन्त्र भैरव के द्वारा समुद्धृत (प्रकट) किया गया।