Vijñāna Bhairava Tantra · 1.160

Vijñāna Bhairava Tantra 1.160

1.160
सर्वशक्तिप्रभेदानां हृदयं ज्ञातमद्य च । रुद्रयामलमासाद्य देवि त्वत्तो मयोदितम् ॥१६०॥
sarvaśaktiprabhedānāṃ hṛdayaṃ jñātam adya ca | rudrayāmalam āsādya devi tvatto mayoditam
anuṣṭubh
— समस्त शक्ति के भेदों का (षष्ठी बहुवचन — समासगत) ; — हृदय, रहस्य (कर्ता कारक) ; — प्राप्त करके (क्त्वान्त)

हे देवि (— यह श्रीदेवी का अंतिम कथन है, या भैरव का —)! आज समस्त शक्ति के भेदों का हृदय (रहस्य) ज्ञात हो गया; रुद्रयामल को प्राप्त करके, हे देवि, आपसे (अथवा 'आपको') मैंने यह कह दिया।