The Essence of the Tantra· 9.36 / 53

The Essence of the Tantra9.36

9.36

स्वकार्यकर्तृता तु ग्राहकरूपता इति उक्तं न सा भूयो गण्यते इत्य् एवं विवेकधना गुरूपवेशानुशीलिनः सर्वत्र पाञ्चदश्यं प्रविभागेन विविञ्चते

Transliteration (IAST)

svakāryakartṛtā tu grāhakarūpatā iti uktaṃ na sā bhūyo gaṇyate ity evaṃ vivekadhanā gurūpaveśānuśīlinaḥ sarvatra pāñcadaśyaṃ pravibhāgena viviñcate

— स्व-कार्य-कर्तृता — अपने कार्य का कर्तृत्व ; — ग्राहक-रूपता — प्रमाता होने की दशा ; — वह पुनः नहीं गिनी जाती ; — विवेक-धन — जिनका धन विवेक है ; — गुरु-उपदेश के अनुशीलक ; — पाञ्चदश्य — पन्द्रह तुटियों का समूह ; — प्रविभाग से (उप-विभाजन द्वारा) ; — विविक्त करते हैं, पृथक् करते हैं

किन्तु स्व-कार्य-कर्तृता तो ग्राहक-रूपता है — ऐसा कहा गया, अतः वह पुनः नहीं गिनी जाती। इस प्रकार विवेक-धन (विवेकयुक्त), गुरु-उपदेश के अनुशीलक सर्वत्र पाञ्चदश्य (पन्द्रह-रूपता) को प्रविभाग से विविक्त (विवेचित) करते हैं।