The Essence of the Tantra· 7.25 / 28

The Essence of the Tantra7.25

7.25

शिवतत्त्वं पुनर् अपरिमेयं सर्वाध्वोत्तीर्णं सर्वाध्वव्यापकं च

Transliteration (IAST)

śivatattvaṃ punar aparimeyaṃ sarvādhvottīrṇaṃ sarvādhvavyāpakaṃ ca

— शिव-तत्त्व ; — अपरिमेय — अमेय, अमाप्य ; — समस्त अध्वाओं से उत्तीर्ण (परे) ; — समस्त अध्वाओं का व्यापक

किन्तु शिव-तत्त्व अपरिमेय (अमेय) है, समस्त अध्वाओं से उत्तीर्ण तथा समस्त अध्वाओं का व्यापक है।