The Essence of the Tantra· 6.45 / 82

The Essence of the Tantra6.45

6.45

एवं यः अव्यक्तकालः तं दशभिः परार्धैः गुणयित्वा मायादिनं कथयेत् तावती रात्रिः

Transliteration (IAST)

evaṃ yaḥ avyaktakālaḥ taṃ daśabhiḥ parārdhaiḥ guṇayitvā māyādinaṃ kathayet tāvatī rātriḥ

— अव्यक्त-काल ; — दस परार्धों से ; — गुणित कर के ; — माया का एक दिन ; — कहना चाहिए ; — रात्रि

इस प्रकार जो अव्यक्त-काल है, उसे दस परार्धों से गुणित कर के माया का एक दिन कहना चाहिए; उतनी ही रात्रि।