The Essence of the Tantra· 5.26 / 43

The Essence of the Tantra5.26

5.26

एवम् उच्चारविश्रान्तौ यत् परं स्पन्दनं गलिताशेषवेद्यं यच् च उन्मिषद् वेद्यं यच् च उन्मिषितवेद्यं तद् एव लिङ्गत्रयम् इति वक्ष्यामः स्वावसरे

Transliteration (IAST)

evam uccāraviśrāntau yat paraṃ spandanaṃ galitāśeṣavedyaṃ yac ca unmiṣad vedyaṃ yac ca unmiṣitavedyaṃ tad eva liṅgatrayam iti vakṣyāmaḥ svāvasare

— उच्चार-विश्रान्ति में ; — परम स्पन्दन ; — जिसमें समस्त वेद्य गलित (विलीन) हो गया ; — उन्मिषद्-वेद्य — जिसमें ज्ञेय उन्मीलित हो रहा है ; — उन्मिषित-वेद्य — जिसमें ज्ञेय उन्मीलित हो चुका ; — लिङ्ग-त्रय — तीन लिङ्ग (चिह्न) ; — अपने प्रसंग में, उचित अवसर पर

इस प्रकार उच्चार-विश्रान्ति में जो परम स्पन्दन है जिसमें समस्त वेद्य गलित (विलीन) हो गया, जो उन्मिषद्-वेद्य (वेद्य जिसमें उन्मीलित हो रहा) है, और जो उन्मिषित-वेद्य (जिसमें वेद्य उन्मीलित हो चुका) है — वही लिङ्ग-त्रय है — ऐसा हम अपने प्रसंग में कहेंगे।