The Essence of the Tantra· 4.7 / 46

The Essence of the Tantra4.7

4.7

न विन्दन्ति परं तत्त्वं सर्वज्ञज्ञानवर्जिताः इति

Transliteration (IAST)

na vindanti paraṃ tattvaṃ sarvajñajñānavarjitāḥ iti

— प्राप्त नहीं करते, नहीं पाते ; — परम तत्त्व ; — सर्वज्ञ के ज्ञान से रहित

सर्वज्ञ के ज्ञान से रहित होने के कारण वे परम तत्त्व को प्राप्त नहीं करते' — ऐसा।