The Essence of the Tantra· 20.55 / 65

The Essence of the Tantra20.55

20.55

ततो ऽपि पूजयित्वा विद्यापीठं विसर्ज्य उपलिप्य अगाधे तत् क्षेपयेत्

Transliteration (IAST)

tato 'pi pūjayitvā vidyāpīṭhaṃ visarjya upalipya agādhe tat kṣepayet

— पूजा करके ; — विद्यापीठ (सत्-विद्या का आसन) ; — विसर्जन करके (देवताओं का) ; — उपलिप्त करके (मण्डल को मिटाकर) ; — गहरे जल में ; — उसे डाल दे

उसके बाद भी पूजा करके, विद्यापीठ का विसर्जन करके, (मण्डल को) उपलिप्त करके (मिटाकर), उसे गहरे जल में डाल दे।