The Essence of the Tantra· 2.2 / 4

The Essence of the Tantra2.2

2.2

यदा खलु दृढशक्तिपाताविद्धः स्वयम् एव इत्थं विवेचयति सकृद् एव गुरुवचनम् अवधार्य तदा पुनर् उपायविरहितो नित्योदितः अस्य समावेशः

Transliteration (IAST)

yadā khalu dṛḍhaśaktipātāviddhaḥ svayam eva itthaṃ vivecayati sakṛd eva guruvacanam avadhārya tadā punar upāyavirahito nityoditaḥ asya samāveśaḥ

— जब ; — दृढ़ शक्तिपात से विद्ध (बिंधा हुआ) ; — स्वयं ही, अपने आप ; — इस प्रकार, ऐसे ; — विवेचन करता है, विवेक करता है ; — एक ही बार, सकृत् ; — गुरु का वचन ; — अवधारित कर के, ग्रहण कर के ; — उपाय-रहित ; — नित्योदित — सदा-प्रकाशित ; — समावेश — शिव में आवेश/तल्लीनता

जब कोई दृढ़ शक्तिपात से विद्ध (बिंधा हुआ) साधक गुरु के वचन को एक ही बार अवधारित कर के स्वयं ही इस प्रकार विवेचन कर लेता है, तब उसका समावेश उपाय-रहित तथा नित्योदित (सदा-प्रकाशित) हो जाता है।