The Essence of the Tantra· 14.9 / 29

The Essence of the Tantra14.9

14.9

किं बहुना तर्पणनैवेद्यपरिपूर्णं वित्तशाठ्यविरहितो यागस्थानं कुर्यात्

Transliteration (IAST)

kiṃ bahunā tarpaṇanaivedyaparipūrṇaṃ vittaśāṭhyavirahito yāgasthānaṃ kuryāt

— अधिक क्या (कहें)? ; — तर्पण एवं नैवेद्य से परिपूर्ण ; — वित्त-शाठ्य (धन की कृपणता) से रहित ; — याग-स्थान ; — करे

अधिक क्या? वित्त-शाठ्य (धन की कृपणता) से रहित होकर याग-स्थान को तर्पण एवं नैवेद्य से परिपूर्ण करे।