The Essence of the Tantra· 14.15 / 29

The Essence of the Tantra14.15

14.15

तथाविधं शिष्यम् अर्घपात्रविप्रुट्प्रोक्षितं पुष्पादिभिश् च पूजितं कृत्वा समस्तम् अध्वानं तद्देहे न्यसेत्

Transliteration (IAST)

tathāvidhaṃ śiṣyam arghapātravipruṭprokṣitaṃ puṣpādibhiś ca pūjitaṃ kṛtvā samastam adhvānaṃ taddehe nyaset

— वैसे (तैयार किये गये) शिष्य को ; — शिष्य ; — अर्घ-पात्र की बूँदों से प्रोक्षित ; — पुष्प आदि से पूजित ; — कर के ; — समस्त अध्वा को ; — उसके देह में ; — न्यस्त करे (स्थापित करे)

वैसे शिष्य को अर्घ-पात्र की विप्रुड् (बूँदों) से प्रोक्षित तथा पुष्प आदि से पूजित कर, समस्त अध्वा को उसके देह में न्यस्त करे।