The Essence of the Tantra· 13.38 / 101

The Essence of the Tantra13.38

13.38

खेचरीयं खसञ्चारम्स्थितिभ्यां खामृताशनात्

Transliteration (IAST)

khecarīyaṃ khasañcāramsthitibhyāṃ khāmṛtāśanāt

— खेचरी (आकाश में विचरने वाली) ; — ख (आकाश) में संचार एवं स्थिति के कारण ; — ख-अमृत (आकाश के अमृत) के भक्षण से

यह खेचरी है — ख (आकाश) में संचार एवं स्थिति के कारण, तथा ख-अमृत (आकाश के अमृत) का अशन (भक्षण) करने के कारण।