The Essence of the Tantra· 13.12 / 101

The Essence of the Tantra13.12

13.12

एवम् अर्घपात्रे न्यस्य पुष्पधूपाद्यैः पूजयित्वा तद्विप्रुड्भिर् यागसारं पुष्पादि च प्रोक्षयेत्

Transliteration (IAST)

evam arghapātre nyasya puṣpadhūpādyaiḥ pūjayitvā tadvipruḍbhir yāgasāraṃ puṣpādi ca prokṣayet

— अर्घ-पात्र में न्यास कर ; — पुष्प, धूप आदि से ; — उसकी विप्रुड् (बूँदों) से ; — याग-सार (यज्ञ-द्रव्य) ; — प्रोक्षण (छिड़काव) करे

इस प्रकार अर्घ-पात्र में न्यास कर, पुष्प, धूप आदि से पूजा कर, उसकी विप्रुड् (बूँदों) से याग-सार तथा पुष्प आदि का प्रोक्षण (छिड़काव) करे।