The Heart of Recognition · 1.2

The Heart of Recognition 1.2

1.2
स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति ॥२॥
svecchayā svabhittau viśvam unmīlayati
sūtra
— अपनी इच्छा से ; — अपनी ही भित्ति (आत्म-रूप पट) पर ; — विश्व को ; — उन्मीलित करती है, प्रकट करती है (शाब्दिक — 'खोलती है')

वह अपनी स्वेच्छा से अपने ही भित्ति-पट पर विश्व को उन्मीलित (प्रकट) करती है।