अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसानन्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥
८-८ ॥
abhyāsayogayuktena cetasānanyagāminā |
paramaṃ puruṣaṃ divyaṃ yāti pārthānucintayan ||
8-8 ||
हे पार्थ, अभ्यासयोग से युक्त और अन्यत्र न जाने वाले चित्त से उसका चिन्तन करता हुआ मनुष्य परम दिव्य पुरुष को प्राप्त करता है।