Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 8.8 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)8.8

8.8
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसानन्यगामिना । परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥ ८-८ ॥
abhyāsayogayuktena cetasānanyagāminā | paramaṃ puruṣaṃ divyaṃ yāti pārthānucintayan || 8-8 ||
— अभ्यासयोग से युक्त ; — अन्यत्र न जाने वाले चित्त से ; — परम दिव्य पुरुष को ; — प्राप्त करता है, हे पार्थ, चिन्तन करता हुआ

हे पार्थ, अभ्यासयोग से युक्त और अन्यत्र न जाने वाले चित्त से उसका चिन्तन करता हुआ मनुष्य परम दिव्य पुरुष को प्राप्त करता है।