Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.44 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.44

18.44
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् । पयुत्थानात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ १८-४४ ॥
kṛṣigorakṣyavāṇijyaṃ vaiśyakarma svabhāvajam | payutthānātmakaṃ karma śūdrasyāpi svabhāvajam || 18-44 ||
— कृषि, गोरक्षा, वाणिज्य ; — वैश्य का स्वभावजनित कर्म ; — सेवा-स्वरूप कर्म ; — शूद्र का भी स्वभावजनित

कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य वैश्य के स्वभावजनित कर्म हैं; और सेवा-स्वरूप कर्म शूद्र का भी स्वभावजनित कर्म है।