गङ्गातोये शिलादौ च स्पृष्टदोषोऽपि वर्तते ।
परब्रह्मार्पिते द्रव्ये स्पृष्टास्पृष्टं न विद्यते ॥८०॥
gaṅgātoye śilādau ca spṛṣṭadoṣo'pi vartate |
parabrahmārpite dravye spṛṣṭāspṛṣṭaṃ na vidyate ||80||
— गङ्गा के जल में; — शिला (शालग्राम) आदि में; — और; — स्पर्श-दोष; — भी; — रहता है; — परम ब्रह्म को अर्पित होने पर; — द्रव्य में; — स्पृष्ट-अस्पृष्ट का (भेद); — नहीं; — रहता
गङ्गा के जल में, शिला (शालग्राम) आदि में स्पर्श-दोष भले ही रहता हो; पर परम ब्रह्म को अर्पित द्रव्य में स्पृष्ट-अस्पृष्ट का (भेद) नहीं रहता।