The Great Liberation Tantra· 3.80 / 153

The Great Liberation Tantra3.80

3.80
गङ्गातोये शिलादौ च स्पृष्टदोषोऽपि वर्तते । परब्रह्मार्पिते द्रव्ये स्पृष्टास्पृष्टं न विद्यते ॥८०॥
gaṅgātoye śilādau ca spṛṣṭadoṣo'pi vartate | parabrahmārpite dravye spṛṣṭāspṛṣṭaṃ na vidyate ||80||
— गङ्गा के जल में ; — शिला (शालग्राम) आदि में ; — और ; — स्पर्श-दोष ; — भी ; — रहता है ; — परम ब्रह्म को अर्पित होने पर ; — द्रव्य में ; — स्पृष्ट-अस्पृष्ट का (भेद) ; — नहीं ; — रहता

गङ्गा के जल में, शिला (शालग्राम) आदि में स्पर्श-दोष भले ही रहता हो; पर परम ब्रह्म को अर्पित द्रव्य में स्पृष्ट-अस्पृष्ट का (भेद) नहीं रहता।