The Great Liberation Tantra3.81
पक्वं वाऽपि न पक्वं वा मन्त्रेणानेन मन्त्रितम् ।
साधको ब्रह्मसात् कृत्वा भुञ्जीयात् स्वजनैः सह ॥८१॥
pakvaṃ vā'pi na pakvaṃ vā mantreṇānena mantritam |
sādhako brahmasāt kṛtvā bhuñjīyāt svajanaiḥ saha ||81||
— पका ; — अथवा ; — नहीं ; — पका ; — अथवा ; — इस मन्त्र से ; — अभिमन्त्रित ; — साधक ; — ब्रह्म को समर्पित करके ; — खाए ; — अपने स्वजनों के साथ ; — साथ पका हो या अपका, इस मन्त्र से अभिमन्त्रित (अन्न को) साधक ब्रह्म को समर्पित करके अपने स्वजनों सहित खाए।