The Great Liberation Tantra3.57
ततो नेत्रे समुन्मील्य जप्त्वा मूलं स्वशक्तितः ।
तज्जपं ब्रह्मसात् कृत्वा स्तोत्रञ्च कवचं पठेत् ॥५७॥
tato netre samunmīlya japtvā mūlaṃ svaśaktitaḥ |
tajjapaṃ brahmasāt kṛtvā stotrañca kavacaṃ paṭhet ||57||
— तदनन्तर ; — नेत्रों को ; — खोलकर ; — जपकर ; — मूल-मन्त्र को ; — अपनी शक्ति के अनुसार ; — उस जप को ; — ब्रह्म को समर्पित करके ; — और स्तोत्र ; — कवच ; — पढ़े तदनन्तर नेत्र खोलकर, अपनी शक्ति के अनुसार मूल-मन्त्र जपकर, उस जप को ब्रह्म को समर्पित करके, स्तोत्र और कवच का पाठ करे।