The Great Liberation Tantra· 3.56 / 153

The Great Liberation Tantra3.56

3.56
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥५६॥
brahmārpaṇaṃ brahmahavirbrahmāgnau brahmaṇā hutam | brahmaiva tena gantavyaṃ brahmakarmasamādhinā ||56||
— अर्पण ब्रह्म है ; — हवि ब्रह्म है ; — ब्रह्म-रूपी अग्नि में ; — ब्रह्म के द्वारा ; — हवन किया गया ; — ब्रह्म ही ; — उसके द्वारा ; — प्राप्तव्य ; — ब्रह्ममय कर्म की समाधि से

(यह कहते हुए:) 'अर्पण ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, ब्रह्म-रूपी अग्नि में ब्रह्म के द्वारा हवन किया गया; ब्रह्ममय कर्म की समाधि से उसके द्वारा ब्रह्म ही प्राप्तव्य है।'