The Great Liberation Tantra· 3.41 / 153

The Great Liberation Tantra3.41

3.41
तारं सच्चिदेकमिति ब्रह्मेति सकलं ततः । अङ्गुष्ठतर्जनीमध्यानामिकासु महेश्वरि ॥४१॥
tāraṃ saccidekamiti brahmeti sakalaṃ tataḥ | aṅguṣṭhatarjanīmadhyānāmikāsu maheśvari ||41||
— प्रणव को ; — 'सत्-चित्-एकम्' (को) ; — 'ब्रह्म' (को) ; — सम्पूर्ण (मन्त्र) को ; — फिर ; — अंगुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा और अनामिका पर ; — हे महेश्वरि

हे महेश्वरि, प्रणव, फिर 'सत्-चित्-एकम्', फिर 'ब्रह्म' — यह सम्पूर्ण (मन्त्र) अंगुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा और अनामिका पर,