The Great Liberation Tantra3.22
किं दानैः किं जपैर्होमैः किमन्यैर्बहुसाधनैः ।
वयमक्षयतृप्ताः स्म सत्पुत्रस्यास्य साधनात् ॥२२॥
kiṃ dānaiḥ kiṃ japairhomaiḥ kimanyairbahusādhanaiḥ |
vayamakṣayatṛptāḥ sma satputrasyāsya sādhanāt ||22||
— क्या ; — दानों से ; — क्या ; — जप-होमों से ; — अन्य बहुत-से साधनों से क्या ; — हम ; — अक्षय रूप से तृप्त ; — हैं ; — इस सत्पुत्र के ; — साधन से 'दानों से क्या, जप-होमों से क्या, और अन्य बहुत-से साधनों से क्या? हम इस सत्पुत्र के साधन से अक्षय रूप से तृप्त हैं।'