— अपने (शरीर) के समान (अव्यय); — दूसरे के शरीर में भी (अधिकरण — समासगत + अव्यय); — संवित् (चैतन्य-बोध) का अनुभव करे (कर्म + विधि लिङ्); — अपने शरीर की अपेक्षा को (कर्म + षष्ठी — समासगत); — छोड़कर (क्त्वान्त); — कुछ दिनों में व्यापी हो जाता है (कर्ता + करण + विधि लिङ्)
अपने (शरीर के) समान दूसरे के शरीर में भी संवित् (चैतन्य-बोध) का अनुभव करे; अपने शरीर की अपेक्षा छोड़कर कुछ दिनों में (साधक) व्यापी (सर्वव्यापी) हो जाता है। (धारणा ७२)