Vijñāna Bhairava Tantra · 1.91

Vijñāna Bhairava Tantra 1.91

1.91
निराधारं मनः कृत्वा विकल्पान्न विकल्पयेत् । तदात्मपरमात्मत्वे भैरवो मृगलोचने ॥९१॥
nirādhāraṃ manaḥ kṛtvā vikalpān na vikalpayet | tadātmaparamātmatve bhairavo mṛgalocane
anuṣṭubh
— मन को निराधार करके (कर्म + विशेषण + क्त्वान्त) ; — विकल्पों की रचना न करे (कर्म + निषेध + विधि लिङ्) ; — तब आत्म-परमात्म-भाव में (अव्यय + अधिकरण — समासगत) ; — भैरव, हे मृगनयनी (कर्ता + सम्बोधन)

हे मृगनयनी! मन को निराधार करके विकल्पों की रचना न करे; तब आत्म-परमात्म-भाव में भैरव (का साक्षात्कार होता) है। (धारणा ७३)