nirādhāraṃ manaḥ kṛtvā vikalpān na vikalpayet |
tadātmaparamātmatve bhairavo mṛgalocane
anuṣṭubh
— मन को निराधार करके (कर्म + विशेषण + क्त्वान्त); — विकल्पों की रचना न करे (कर्म + निषेध + विधि लिङ्); — तब आत्म-परमात्म-भाव में (अव्यय + अधिकरण — समासगत); — भैरव, हे मृगनयनी (कर्ता + सम्बोधन)
हे मृगनयनी! मन को निराधार करके विकल्पों की रचना न करे; तब आत्म-परमात्म-भाव में भैरव (का साक्षात्कार होता) है। (धारणा ७३)