Vijñāna Bhairava Tantra · 1.40

Vijñāna Bhairava Tantra 1.40

1.40
पृष्ठशून्यं मूलशून्यं हृच्छून्यं भावयेत्स्थिरम् । युगपन्निर्विकल्पत्वान्निर्विकल्पोदयस्ततः ॥४०॥
pṛṣṭhaśūnyaṃ mūlaśūnyaṃ hṛcchūnyaṃ bhāvayet sthiram | yugapannirvikalpatvān nirvikalpodayas tataḥ
anuṣṭubh
— पृष्ठ-शून्य (कर्म कारक — समासगत) ; — मूल-शून्य (कर्म कारक — समासगत) ; — हृत्-शून्य, हृदय का शून्य (कर्म कारक — समासगत) ; — स्थिर रूप से भावना करे (विधि लिङ् + विशेषण) ; — एक साथ, युगपत् (अव्यय) ; — निर्विकल्पता से, विचार-शून्यता से (अपादान कारक) ; — तब निर्विकल्प (अवस्था) का उदय (होता है) — कर्ता कारक

पृष्ठ-शून्य, मूल-शून्य और हृत्-शून्य (हृदय का शून्य) — तीनों की एक साथ स्थिर रूप से भावना करे; (इस प्रकार) निर्विकल्पता से तब निर्विकल्प (अवस्था) का उदय होता है। (धारणा २२)