— पृष्ठ-शून्य (कर्म कारक — समासगत); — मूल-शून्य (कर्म कारक — समासगत); — हृत्-शून्य, हृदय का शून्य (कर्म कारक — समासगत); — स्थिर रूप से भावना करे (विधि लिङ् + विशेषण); — एक साथ, युगपत् (अव्यय); — निर्विकल्पता से, विचार-शून्यता से (अपादान कारक); — तब निर्विकल्प (अवस्था) का उदय (होता है) — कर्ता कारक
पृष्ठ-शून्य, मूल-शून्य और हृत्-शून्य (हृदय का शून्य) — तीनों की एक साथ स्थिर रूप से भावना करे; (इस प्रकार) निर्विकल्पता से तब निर्विकल्प (अवस्था) का उदय होता है। (धारणा २२)