Vijñāna Bhairava Tantra · 1.157

Vijñāna Bhairava Tantra 1.157

1.157
श्रोत्रात्मनोऽसमता शक्तिश्चास्य चित्तसमता समा । आत्मध्यानेन या प्राप्तिः सेयं तत्त्वस्य भावना ॥१५७॥
śrotrātmano'samatā śaktiś cāsya cittasamatā samā | ātmadhyānena yā prāptiḥ seyaṃ tattvasya bhāvanā
anuṣṭubh
— श्रोता-आत्मा का (षष्ठी — समासगत) [पाठ अनिश्चित] ; — चित्त-समता, मन की समता (कर्ता कारक — समासगत) ; — तत्त्व की भावना, परम तत्त्व का अनुभव (कर्ता कारक)

श्रोता-आत्मा की असमता (असम-शक्ति) तथा इसकी चित्त-समता दोनों समान हैं; आत्म-ध्यान से जो प्राप्ति है, वही यह तत्त्व की भावना है।