Vijñāna Bhairava Tantra · 1.135

Vijñāna Bhairava Tantra 1.135

1.135
चिद्धर्मा सर्वदेहेषु विशेषो नास्ति कुत्रचित् । अतश्च तन्मयं सर्वं भावयन्भवजिज्जनः ॥१३५॥
ciddharmā sarvadeheṣu viśeṣo nāsti kutracit | ataś ca tanmayaṃ sarvaṃ bhāvayan bhavajij janaḥ
anuṣṭubh
— चित्-धर्म वाले (समासगत विशेषण) ; — विशेष, भेद (कर्ता कारक) ; — भव-जित्, संसार-विजयी (कर्ता कारक — समासगत)

[पुनरुक्ति — श्लोक ८३] सब देहों में चित्-धर्म है, कहीं विशेष (भेद) नहीं — तन्मय सर्व की भावना करता हुआ (साधक) भव-जित् हो जाता है।