The Essence of the Tantra· 8.60 / 93

The Essence of the Tantra8.60

8.60

क्रमश् च विद्यारागादीनां विचित्रो ऽपि दृष्टः कश्चिद् रज्यन् वेत्ति को ऽपि विदन् रज्यते इत्यादि

Transliteration (IAST)

kramaś ca vidyārāgādīnāṃ vicitro 'pi dṛṣṭaḥ kaścid rajyan vetti ko 'pi vidan rajyate ityādi

— विद्या, राग आदि का ; — विचित्र — नानाविध ; — रञ्जित होता हुआ जानता है ; — जानता हुआ रञ्जित होता है

और विद्या, राग आदि का क्रम विचित्र भी देखा गया — कोई रञ्जित (आसक्त) होता हुआ जानता है, कोई जानता हुआ रञ्जित होता है, इत्यादि।