The Essence of the Tantra· 5.34 / 43

The Essence of the Tantra5.34

5.34

अभ्यासनिष्ठो ऽत्र तु सृष्टिसंहृद्विमर्शधामन्य् अचिरेण रोहेत्

Transliteration (IAST)

abhyāsaniṣṭho 'tra tu sṛṣṭisaṃhṛdvimarśadhāmany acireṇa rohet

— अभ्यास-निष्ठ — अभ्यास में तत्पर ; — सृष्टि-संहार के विमर्श-धाम में ; — शीघ्र ही आरूढ़ हो जाता है

किन्तु यहाँ अभ्यास-निष्ठ (साधक) शीघ्र ही सृष्टि-संहार के विमर्श-धाम में आरूढ़ हो जाता है।