The Essence of the Tantra· 5.13 / 43

The Essence of the Tantra5.13

5.13

तद् ग्रस्तसर्वबाह्यान्तर्भावमण्डलम् आत्मनि

Transliteration (IAST)

tad grastasarvabāhyāntarbhāvamaṇḍalam ātmani

— समस्त बाह्य-आभ्यन्तर भावों के मण्डल को ग्रसित कर के ; — आत्मा में

फिर समस्त बाह्य-आभ्यन्तर भावों के मण्डल को आत्मा में ग्रसित (समाहित) कर के,