The Essence of the Tantra· 5.12 / 43

The Essence of the Tantra5.12

5.12

व्योमभिर् निःसरद् बाह्ये ध्यायेत् सृष्ट्यादिभावकम्

Transliteration (IAST)

vyomabhir niḥsarad bāhye dhyāyet sṛṣṭyādibhāvakam

— व्योमों (इन्द्रिय-छिद्रों) से ; — निःसृत होते हुए ; — बाहर (बाह्य विषय पर) ; — सृष्टि आदि का भावक (कर्ता)

व्योमों (इन्द्रिय-छिद्रों) से निःसृत होते हुए, बाहर सृष्टि आदि का भावक (कर्ता) रूप में ध्यान करे;