The Essence of the Tantra· 22.21 / 53

The Essence of the Tantra22.21

22.21

निजनिजभोगाभोगप्रविकासमयस्वरूपपरिमर्शे । क्रमशो ऽनुचक्रदेव्यः संविच्चक्रं हि मध्यमं यान्ति

Transliteration (IAST)

nijanijabhogābhogapravikāsamayasvarūpaparimarśe | kramaśo 'nucakradevyaḥ saṃviccakraṃ hi madhyamaṃ yānti

— अपने-अपने भोग के विस्तार के पूर्ण विकास-रूप ; — स्वरूप-परिमर्श में ; — क्रमशः ; — अनुचक्र-देवियाँ ; — मध्यम संवित्-चक्र में ; — जाती (प्रवेश करती) हैं

अपने-अपने भोग के विस्तार के पूर्ण विकास-रूप स्वरूप-परिमर्श में, क्रमशः अनुचक्र-देवियाँ मध्यम संवित्-चक्र में जाती (प्रवेश करती) हैं।