निजनिजभोगाभोगप्रविकासमयस्वरूपपरिमर्शे । क्रमशो ऽनुचक्रदेव्यः संविच्चक्रं हि मध्यमं यान्ति
Transliteration (IAST)
nijanijabhogābhogapravikāsamayasvarūpaparimarśe | kramaśo 'nucakradevyaḥ saṃviccakraṃ hi madhyamaṃ yānti
अपने-अपने भोग के विस्तार के पूर्ण विकास-रूप स्वरूप-परिमर्श में, क्रमशः अनुचक्र-देवियाँ मध्यम संवित्-चक्र में जाती (प्रवेश करती) हैं।