The Essence of the Tantra· 17.2 / 6

The Essence of the Tantra17.2

17.2

ततः साधारणमन्त्रेण शिवीकृते अग्नौ व्रतशुद्धिं कुर्यात् तन्मन्त्रसम्पुटं नाम कृत्वा प्रायश्चित्तं शोधयामि इति स्वाहान्तं शतं जुहुयात्

Transliteration (IAST)

tataḥ sādhāraṇamantreṇa śivīkṛte agnau vrataśuddhiṃ kuryāt tanmantrasampuṭaṃ nāma kṛtvā prāyaścittaṃ śodhayāmi iti svāhāntaṃ śataṃ juhuyāt

— साधारण मन्त्र से ; — शिवीकृत अग्नि में ; — व्रत-शुद्धि करे (पूर्व व्रत का शोधन करे) ; — उस मन्त्र से सम्पुट कर (दोनों ओर घेरकर) ; — नाम जोड़कर ; — 'प्रायश्चित्त को मैं शोधित करता हूँ' ; — स्वाहा-अन्त ; — सौ बार आहुति दे

फिर साधारण मन्त्र से शिवीकृत अग्नि में व्रत-शुद्धि करे — उस मन्त्र से सम्पुट कर, नाम जोड़कर, 'प्रायश्चित्तं शोधयामि' इस प्रकार स्वाहा-अन्त सौ बार आहुति दे।