The Essence of the Tantra· 14.7 / 29

The Essence of the Tantra14.7

14.7

ततो मध्यशूलमध्यारायां समस्तं देवताचक्रं लोकपालास्त्रपर्यन्तम् अभिन्नतयैव पूजयेत् तदधिष्ठानात् सर्वत्र पूजितम्

Transliteration (IAST)

tato madhyaśūlamadhyārāyāṃ samastaṃ devatācakraṃ lokapālāstraparyantam abhinnatayaiva pūjayet tadadhiṣṭhānāt sarvatra pūjitam

— मध्य-शूल के मध्य-अरा पर ; — समस्त देवता-चक्र ; — लोकपाल एवं अस्त्र-पर्यन्त ; — अभिन्न रूप से (एकात्म रूप से) ; — उसके अधिष्ठान से सर्वत्र पूजित

फिर मध्य-शूल के मध्य-अरा पर समस्त देवता-चक्र को, लोकपाल एवं अस्त्र-पर्यन्त, अभिन्न रूप से ही पूजे; उसके अधिष्ठान से सर्वत्र पूजित (हो जाता है)।