The Essence of the Tantra· 13.72 / 101

The Essence of the Tantra13.72

13.72

ततः स्वयं चरुभोजनं कृत्वा शिष्यात्मना सह ऐक्यम् आपन्नः प्रबुद्धवृत्तिः तिष्ठेत्

Transliteration (IAST)

tataḥ svayaṃ carubhojanaṃ kṛtvā śiṣyātmanā saha aikyam āpannaḥ prabuddhavṛttiḥ tiṣṭhet

— स्वयं चरु-भोजन कर ; — शिष्य के आत्मा के साथ ऐक्य को प्राप्त ; — प्रबुद्ध-वृत्ति (जागृत बोध-वृत्ति वाला) ; — स्थित रहे

फिर स्वयं चरु-भोजन कर, शिष्य के आत्मा के साथ ऐक्य को प्राप्त, प्रबुद्ध-वृत्ति होकर स्थित रहे।