The Essence of the Tantra· 13.24 / 101

The Essence of the Tantra13.24

13.24

एवं स्वात्मसूर्यपरमेशत्रितयैकीभावनया दिक्चर्चा इति अभिनवगुप्तगुरवः

Transliteration (IAST)

evaṃ svātmasūryaparameśatritayaikībhāvanayā dikcarcā iti abhinavaguptaguravaḥ

— स्व-आत्मा, सूर्य एवं परमेश के त्रितय की एकी-भावना से ; — दिक्-चर्चा — दिशाओं का विचार ; — अभिनवगुप्त के गुरु (कहते हैं)

इस प्रकार स्व-आत्मा, सूर्य एवं परमेश — इस त्रितय की एकी-भावना से दिक्-चर्चा (होती है) — ऐसा अभिनवगुप्त के गुरु (कहते हैं)।