The Great Liberation Tantra· 3.64 / 153

The Great Liberation Tantra3.64

3.64
पञ्चरत्नमिदं स्तोत्रं ब्रह्मणः परमात्मनः । यः पठेत् प्रयतो भूत्वा ब्रह्मसायुज्यमाप्नुयात् ॥६४॥
pañcaratnamidaṃ stotraṃ brahmaṇaḥ paramātmanaḥ | yaḥ paṭhet prayato bhūtvā brahmasāyujyamāpnuyāt ||64||
— 'पंचरत्न' ; — यह ; — स्तोत्र ; — ब्रह्म का ; — परमात्मा का ; — जो ; — पाठ करे ; — प्रयत होकर ; — होकर ; — ब्रह्म-सायुज्य को ; — प्राप्त करे

यह ब्रह्म — परमात्मा — का 'पंचरत्न' स्तोत्र है; जो प्रयत होकर इसका पाठ करता है, वह ब्रह्म-सायुज्य प्राप्त कर लेता है।