The Great Liberation Tantra· 3.50 / 153

The Great Liberation Tantra3.50

3.50
हृदयकमलमध्ये निर्विशेषं निरीहम् हरिहरविधिवेद्यं योगिभिर्ध्यानगम्यम् । जननमरणभीतिभ्रंसि सच्चित्स्वरूपम् सकलभुवनबीजं ब्रह्म चैतन्यमीडे ॥५०॥
hṛdayakamalamadhye nirviśeṣaṃ nirīham hariharavidhivedyaṃ yogibhirdhyānagamyam | jananamaraṇabhītibhraṃsi saccitsvarūpam sakalabhuvanabījaṃ brahma caitanyamīḍe ||50||
— हृदय-कमल के मध्य में ; — निर्विशेष ; — निरीह, निश्चेष्ट ; — हरि, हर और ब्रह्मा से वेद्य ; — योगियों द्वारा ध्यान से गम्य ; — जन्म-मरण के भय को नष्ट करने वाले ; — सत्-चित् स्वरूप ; — समस्त भुवनों के बीज ; — ब्रह्म ; — चैतन्य ; — वन्दना करता हूँ

हृदय-कमल के मध्य में मैं ब्रह्म-चैतन्य की वन्दना करता हूँ — जो निर्विशेष, निरीह, हरि, हर और ब्रह्मा से वेद्य, योगियों द्वारा ध्यान से गम्य, जन्म-मरण के भय को नष्ट करने वाला, सत्-चित् स्वरूप, और समस्त भुवनों का बीज है।