The Great Liberation Tantra· 3.2 / 153

The Great Liberation Tantra3.2

3.2
कथितं यत् परं ब्रह्म परमेशं परात्परम् । यस्योपासनतो मर्त्यो भुक्तिं मुक्तिञ्च विन्दति ॥२॥
kathitaṃ yat paraṃ brahma parameśaṃ parātparam | yasyopāsanato martyo bhuktiṃ muktiñca vindati ||2||
— कथित, वर्णित ; — जो ; — परम ; — ब्रह्म ; — परमेश ; — परात्पर ; — जिसकी उपासना से ; — मर्त्य ; — भुक्ति को ; — और मुक्ति को ; — प्राप्त करता है

जिस परम ब्रह्म का — परमेश, परात्पर का — आपने वर्णन किया, जिसकी उपासना से मर्त्य भुक्ति और मुक्ति दोनों प्राप्त करता है —