कथितं यत् परं ब्रह्म परमेशं परात्परम् ।
यस्योपासनतो मर्त्यो भुक्तिं मुक्तिञ्च विन्दति ॥२॥
kathitaṃ yat paraṃ brahma parameśaṃ parātparam |
yasyopāsanato martyo bhuktiṃ muktiñca vindati ||2||
जिस परम ब्रह्म का — परमेश, परात्पर का — आपने वर्णन किया, जिसकी उपासना से मर्त्य भुक्ति और मुक्ति दोनों प्राप्त करता है —