The Great Liberation Tantra· 3.142 / 153

The Great Liberation Tantra3.142

3.142
अहं मृत्युञ्जयो देवि देवदेवो जगद्गुरुः । स्वेच्छाचारी निर्विकल्पो मन्त्रस्याऽस्य प्रसादतः ॥१४२॥
ahaṃ mṛtyuñjayo devi devadevo jagadguruḥ | svecchācārī nirvikalpo mantrasyā'sya prasādataḥ ||142||
— मैं ; — मृत्युंजय ; — हे देवि ; — देवदेव ; — जगद्गुरु ; — स्वेच्छाचारी ; — निर्विकल्प ; — इस मन्त्र के ; — प्रसाद से

हे देवि, मैं इस मन्त्र के प्रसाद से ही मृत्युंजय, देवदेव, जगद्गुरु, स्वेच्छाचारी और निर्विकल्प हूँ।