The Great Liberation Tantra3.107
अष्टोत्तरशतं देवि गायत्रीजपमाचरेत् ।
जपं समर्प्य विधिवत् पूर्ववत् प्रणमेत् सुधीः ॥१०७॥
aṣṭottaraśataṃ devi gāyatrījapamācaret |
japaṃ samarpya vidhivat pūrvavat praṇamet sudhīḥ ||107||
— एक सौ आठ बार ; — हे देवि ; — गायत्री-जप ; — करे ; — जप को ; — समर्पित करके ; — विधिपूर्वक ; — पूर्ववत् ; — प्रणाम करे ; — बुद्धिमान् हे देवि, गायत्री का जप एक सौ आठ बार करे; और जप को विधिपूर्वक समर्पित करके, बुद्धिमान् पूर्ववत् प्रणाम करे।