The Great Liberation Tantra3.105
अथ सन्ध्याविधिं वक्ष्ये ब्रह्ममन्त्रस्य शाम्भवि ।
यां कृत्वा ब्रह्मसम्पत्तिं लभन्ते भुवि मानवाः ॥१०५॥
atha sandhyāvidhiṃ vakṣye brahmamantrasya śāmbhavi |
yāṃ kṛtvā brahmasampattiṃ labhante bhuvi mānavāḥ ||105||
— अब ; — सन्ध्या-विधि को ; — कहूँगा ; — ब्रह्म-मन्त्र की ; — हे शाम्भवि ; — जिसे ; — करके ; — ब्रह्म-सम्पत्ति को ; — प्राप्त करते हैं ; — पृथ्वी पर ; — मनुष्य हे शाम्भवि, अब मैं ब्रह्म-मन्त्र की सन्ध्या-विधि कहूँगा, जिसे करके पृथ्वी पर मनुष्य ब्रह्म-सम्पत्ति प्राप्त करते हैं।