The Great Liberation Tantra· 1.66 / 72

The Great Liberation Tantra1.66

1.66
स्तोत्रपाठं यन्त्रलिपिं पुरश्चर्यां जगत्पते । युगधर्मप्रभावेण स्वभावेन कलौ नराः । भविष्यन्त्यतिदुर्वृत्ताः सर्वथा पापकारिणः ॥६६॥
stotrapāṭhaṃ yantralipiṃ puraścaryāṃ jagatpate | yugadharmaprabhāveṇa svabhāvena kalau narāḥ | bhaviṣyantyatidurvṛttāḥ sarvathā pāpakāriṇaḥ ||66||
— स्तोत्र-पाठ को ; — यन्त्र-लेखन को ; — पुरश्चरण को ; — हे जगत्पते ; — युग-धर्म के प्रभाव से ; — अपने स्वभाव से ; — कलियुग में ; — मनुष्य ; — होंगे ; — अत्यन्त दुराचारी ; — सर्वथा ; — पापकारी

हे जगत्पते, स्तोत्र-पाठ, यन्त्र-लेखन और पुरश्चरण के विषय में — युग-धर्म के प्रभाव से और अपने स्वभाव से, कलियुग में मनुष्य अत्यन्त दुराचारी और सर्वथा पापकारी हो जाएँगे।