Vijñāna Bhairava Tantra · 1.80

Vijñāna Bhairava Tantra 1.80

1.80
यदा ममेच्छा नोत्पन्ना ज्ञानं वा कस्तदास्म्यहम् । तत्त्वतोऽहं तथाभूतस्तल्लीनस्तन्मना भवेत् ॥८०॥
yadā mamecchā notpannā jñānaṃ vā kas tadāsmy aham | tattvato'haṃ tathābhūtas tallīnas tanmanā bhavet
anuṣṭubh
— जब मेरी इच्छा (सम्बन्धवाचक + षष्ठी + कर्ता) ; — उत्पन्न न हुई हो (निषेध + कर्मवाच्य भूत कृदन्त) ; — अथवा ज्ञान (न हुआ हो) — कर्ता + अव्यय ; — तब मैं कौन हूँ? (प्रश्न + वर्तमान उत्तम पुरुष) ; — तत्त्वतः मैं वही (परम) हूँ — कर्ता + अव्यय + विशेषण ; — तल्लीन, उसमें लीन (विशेषण) ; — तन्मन (उसी में मन वाला) हो जाए — कर्ता + विधि लिङ्

जब न मेरी इच्छा उत्पन्न हुई हो और न ज्ञान — तब 'मैं कौन हूँ?' (इस विचार से) तत्त्वतः मैं वही (परम तत्त्व) हूँ — ऐसा होकर तल्लीन, तन्मय हो जाए। (धारणा ६२)