— जब मेरी इच्छा (सम्बन्धवाचक + षष्ठी + कर्ता); — उत्पन्न न हुई हो (निषेध + कर्मवाच्य भूत कृदन्त); — अथवा ज्ञान (न हुआ हो) — कर्ता + अव्यय; — तब मैं कौन हूँ? (प्रश्न + वर्तमान उत्तम पुरुष); — तत्त्वतः मैं वही (परम) हूँ — कर्ता + अव्यय + विशेषण; — तल्लीन, उसमें लीन (विशेषण); — तन्मन (उसी में मन वाला) हो जाए — कर्ता + विधि लिङ्
जब न मेरी इच्छा उत्पन्न हुई हो और न ज्ञान — तब 'मैं कौन हूँ?' (इस विचार से) तत्त्वतः मैं वही (परम तत्त्व) हूँ — ऐसा होकर तल्लीन, तन्मय हो जाए। (धारणा ६२)