The Essence of the Tantra· 20.4 / 65

The Essence of the Tantra20.4

20.4

तद् अपि नित्यं स्वकालनैयत्यात् इति केचित्

Transliteration (IAST)

tad api nityaṃ svakālanaiyatyāt iti kecit

— वह भी नित्य ; — अपने काल की नियतता के कारण ; — ऐसा कुछ (कहते हैं)

वह भी अपने काल की नियतता के कारण नित्य है — ऐसा कुछ (कहते हैं)।