The Essence of the Tantra· 13.41 / 101

The Essence of the Tantra13.41

13.41

अथ यदा दीक्षां चिकीर्षेत् तदाधिवासनार्थं भूमिपरिग्रहं गणेशार्चनं कुम्भकलशयोः पूजां स्थण्डिलार्चनं हवनं च कुर्यात्

Transliteration (IAST)

atha yadā dīkṣāṃ cikīrṣet tadādhivāsanārthaṃ bhūmiparigrahaṃ gaṇeśārcanaṃ kumbhakalaśayoḥ pūjāṃ sthaṇḍilārcanaṃ havanaṃ ca kuryāt

— दीक्षा करना चाहे ; — अधिवासन (पूर्व-संस्कार) के लिए ; — भूमि-परिग्रह — भूमि का ग्रहण ; — गणेश-अर्चन ; — कुम्भ एवं कलश की पूजा ; — स्थण्डिल-अर्चन (वेदी-पूजन) ; — हवन — अग्नि-आहुति

अब जब वह दीक्षा करना चाहे, तब अधिवासन के लिए भूमि-परिग्रह, गणेश-अर्चन, कुम्भ एवं कलश की पूजा, स्थण्डिल-अर्चन तथा हवन करे।