The Essence of the Tantra· 13.35 / 101

The Essence of the Tantra13.35

13.35

द्वादशान्तम् इदं प्राग्रं विशूलं मूलतः स्मरन्

Transliteration (IAST)

dvādaśāntam idaṃ prāgraṃ viśūlaṃ mūlataḥ smaran

— द्वादशान्त-पर्यन्त (बारह अँगुल के बिन्दु तक) ; — तिर-अग्र — तीक्ष्ण नोक वाला ; — विशूल — त्रिशूल ; — मूल से (ऊपर तक) ; — स्मरण करते हुए

इस द्वादशान्त-पर्यन्त, तिर-अग्र (तीक्ष्ण नोक वाले) शूल को मूल से (ऊपर तक) स्मरण करते हुए —