Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 18.6 / 78

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)18.6

18.6
एतान्यपि च कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च । कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ १८-६ ॥
etānyapi ca karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā phalāni ca | kartavyānīti me pārtha niścitaṃ matamuttamam || 18-6 ||
— किन्तु इन कर्मों को भी ; — आसक्ति और फलों को त्यागकर ; — करना चाहिए — हे पार्थ, यह मेरा ; — निश्चित और उत्तम मत

किन्तु इन कर्मों को भी आसक्ति और फलों को त्यागकर करना चाहिए — हे पार्थ, यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है।